Remembering Sant Gadge Baba’s life, teachings, and biography on Birth Anniversary 23 Februar Tribute
Gadge Baba (गाडगे बाबा) का जन्म
Gadge Baba गाडगे बाबा का जन्म 23 फरवरी 1876 को हुआ था। बाबा गाडगे का जन्म एक साधारण से धोबी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झींगराजी और माता का नाम सखूबाई था। गाडगे बाबा के बचपन का नाम डेबूजी था।
उनका पूरा नाम देबूजी झगरजी जानोरकर था। वह अपने माता पिता की दूसरी संतान थे। झींगराजी और सखूबाई की पहली संतान एक पुत्री थी जिसका बचपन में ही देहांत हो गया था।
झींगराजी के पास जमीन जायदाद होने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति कुछ समय के लिए अच्छी रही परंतु शराब की लत की वजह से उन्होंने सब कुछ गंवा दिया। साहूकार ने पैसे उधार देने के लालच में उनकी सारी जमीन अपने नाम लिखवा और बची खुची जायदाद और पशु भी मूलधन के ब्याज के बदले हड़प लिए।
जब डेबूजी की उम्र 7 साल की थी, तब उनके पिता झींगराज की मृत्यु हो गई। सहारे की तलाश में उनकी मां डेबूजी को ले कर अपने माँ बाप और भाई चंद्रभानजी के यहाँ अकोला जिले के मुर्तीजापुर तौलके के दापुरे नाम गाँव में आ गए।
गाडगे बाबा का बचपन कैसा था ?
डेबूजी वहाँ अपने अपने मामा के जानवर चराने के लिए ले जाने के साथ साथ घर के काम में भी मदद करते थे। वहाँ उनकी हमउम्र चरवाहों के साथ दोस्ती हो गई। वह अपनी दोस्तों की मंडली के साथ खूब मस्ती किया करते थे। पास में पूर्णा नदी होने के कारण उन्होंने तैरना भी सिख लिया था।
मंडली के साथ वह गीत और भजन गाया करते थे। मधुर आवाज होने के कारण वह आस पास के गाँव में भी मशहूर हो गए। लोग उन्हें भजन कीर्तन के लिए बुलाने लगे।
12 साल की ऊम्र होते होते डेबूजी ने खेती की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। वह खेती के समय में खेती और खाली समय में भजन कीर्तन किया करते थे।
15 साल की उम्र में पास के ही गाँव कमालपुर के धनाजी खल्लारकर नाम के व्यक्ति को अपनी ही जाति के डेबूजी इतने पसंद आ गए कि अपनी पत्नी की असहमति वे बावजूद उन्होंने अपनी 8 साल की पुत्री का विवाह कुंताबाई से करवा दिया। डेबूजी के विवाह से परिवार के सभी लोग प्रसन्न थे।
पत्थर पूजने में समय और ऊर्जा बर्बाद मत करो – संत गाडगे महाराज
गाडगे बाबा ने भंडारे की नई प्रथा चलाई?
गाँव में भंडारे में हर वर्ग के लोग शामिल हुआ करते थे परंतु पहले भोजन तथाकथित उच्च जाति के सम्पन्न तबके के लोग किया करते थे। बाद में गाँव के अछूत, गरीब, अपाहिज, और बेसहारा लोगों को दूर से फेंक कर भोजन दिया जाता था।
डेबूजी को इस तरह का अमानवीय व्यवहार रास नहीं आया। और उन्होंने गुस्से में उच्च वर्ग के लोगों को साफ तौर पर धमकी दे डाली और भविष्य में किसी भी भंडारे में न शामिल होने को कहा।
उन्होंने गाँव में सभी को एकसाथ बैठाकर भोजन कराने के प्रथा शुरू कराई। साथ ही साथ आपसी भाईचारे के साथ को बढ़ावा दिया।
गाडगे बाबा ने परंपराओं का विरोध कैसे किया?
समय के साथ डेबूजी और कुंताबाई के घर में एक पुत्री का आगमन हुआ। जिसका नाम उन्होंने अलोकाबाई रखा। परिवार के साथ साथ पूरी गाँव में खुशी की लहर थी। परंपरा के अनुसार लोग उनसे दावत की उम्मीद लगा लगा कर बैठे थे। चूंकि बच्चे के जन्म की खुशी में शराब और मांस की दावत होती थी। धीरे धीरे यह जातिधर्म बन चुका था।
डेबूजी ने ऐसी दावत देने से लोगों को मना कर दिया। उन्होंने सभी को लड्डू भेंट किए, जिससे लोग नाराज हो गए। डेबूजी ने उन्हे समझाते हुए कहा कि इसी मांस और शराब की वजह से हमारा समाज बर्बाद हो गया है। हमें इसे त्यागना होगा और ऐसी परम्पराएं जो हमें बर्बादी की ओर ले जाती हैं उन्हें त्यागना होगा।
उनके एक और पुत्री कलवातीबाई, दो पुत्र मुद्गल हुए और गोविंदा परंतु उन्होंने कभी भी कर्मकांड या कुप्रथाओं से कोई संबंध रखा।
जनकल्याण और सेवाभावना
डेबूजी समाज के लिए श्रम दान देने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। वह जहां भी गंदगी दिखाई देती थी उसे साफ करने में लग जाते थे। रास्ते की मरम्मत से लेकर लोगों की मदद करने मे आगे रहते थे। वह लोगों को अंधविश्वास छोड़ने को कहते थे साथ ही बीमारी में टोना टोटका करने के बजाय डॉक्टर के पास जाने के लिए कहते। उन्होंने पशुहत्या, शराब, गाँजा जैसी प्रवत्तियों से लोगों को हमेशा दूर रहने को कहा।
“मानव जाति की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।” – संत गाडगे बाबा
वैराग्य और घर गृहस्थी का त्याग
उन्होंने सन् 1905 में घर का त्याग कर दिया, वह एक धोती पहन एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ में छड़ी लेकर घर से निकल गए. उनका यह वैराग्य किसी देवी देवता या साधु संतों के लिए नहीं था। उनका वैराग्य गरीब, बेसहारा लोगों के मदद करने और धर्म के नाम पर हो रहे कर्मकांड तथा जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए था। वह पूरी तरहसे मानवतावादी थे।
वह बस एक जगह से दूसरे जगह चलते रहते और लोगों की मदद करते रहते। वह कभी किसी महिला के सिर से लकड़ी का गट्ठर उतरवा कर अपने सिर पर रख कर उसे उसके घर पहुँचने में मदद करते। तो कभी किसी की फसल काटने में मदद करते। कभी किसी के खेत में हल चलकर उसकी खेत जोतने में मदद करते। उन्हें जैसा भी खाने को मिलता वह खा लेते।
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर से असीम लगाव
समाजसेवा के कारण गाडगे बाबा कई नेताओं के प्रशंसा के पत्र थे और उनसे उनके संबंध भी रहे, परंतु बाबासाहेब के साथ उनका लगाव अनूठा था। उनकी आपसी मुलाकात के कई प्रसंग हैं जो दिल को छू लेने वाले हैं।
14 जुलाई 1949 को जब गाडगे बाबा डॉ. महाजनी के यहाँ बीमार अवस्था में थे, तब उनके बीमार होने की सूचना महानंदसामी के द्वारा बाबासाहेब को दी गई, बाबासाहेब उस समय कानून मंत्री थे उनको उसी दिन दिल्ली के लिए निकलना था। बाबासाहेब शीघ्र ही उनसे मिलने पहुंचे।
बाबासाहेब को देख कर गाडगे बाबा तरंत उठ कर बैठ गए और बोले, आप यहाँ क्यों आए आपका एक एक मिनट कीमती है हम तो फकीर हैं परंतु आप के पास बहुत बड़ा पद और जिम्मेदारी है। इस पर बाबासाहेब ने कहा,” बाबा हमारा पद तो दो दिन का है, कल कुर्सी से हटे तो हमें कोई नहीं पूछने वाला है। परंतु आप का अधिकार तो अमर है। उस दिन गाडगे बाबा ने पंढ़रपुर में अछूतों के लिए बनाई गई धर्मशाला बाबासाहेब को सौंप दी।
दूसरा प्रसंग तब का है जब बाबासाहब हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाने वाले थे, इसके लिए वह गाडगे बाबा से मिलकर चर्चा करना चाहते थे। उस समय गाडगे बाबा बंबई के जे जे अस्पताल के पास की धर्मशाला में चल रहे स्कूल की देखभाल कर रहे थे।
बाबासाहेब की मिलने की इच्छा जानकार वक उनसे मिलने कोलाबा आए और गहन बातचीत की, और अपने समाज को साथ ले कर बुद्ध की शरण में जाने के इच्छा जताई। गाडगे बाबा ने खुश होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि सारा दलित समाज आपके साथ है, आप उन्हें जो रास्ता बताएंगे वे आपके साथ चलेंगे। तत्पश्चात बाबासाहेब के मंगल कार्य की प्रशांसा कर उन्होंने बाबासाहेब से विदा लिया।
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गाडगे बाबा का परिनिर्वाण
बीमारी की अवस्था में भी गाडगे बाबा ने अपना अंतिम कीर्तन 80 नवंबर 1956 को किया था। वह 80 साल के हो चुके थे। 6 दिसंबर 1956 को बाबासाहब के परिनर्वाण की सूचना मिलने के बाद वह अधिक गंभीर रहने लगे।
7 दिसंबर को वह अमरावती गए वहाँ से वह नागरवाड़ी जाने के इच्छुक थे, परंतु स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण उन्हें इर्विन अस्पताल में भरणी होना पड़ा। 20 दिसंबर को जब वह अस्पताल से निकलकर अमरावती के लिए चल पड़े।
परंतु रास्ते में ही उन्होंने एक आखिरी बार गाड़ी में बैठे सभी लोगों पर एक आखिरी नजर डाली और हमेशा लिए अपनी आँख बंद कर लीं। 20 दिसंबर 1956 को इस महामानव ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
बाबा गाडगे ने अपने अनुयायियों से कहा था, कि जहां मेरी मृत्यु हो जाए वहीं पर मेरा अंतिम संस्कार कर देना। मेरा स्मारक, मन्दिर या मूर्ति कुछ भी मत बनाना। मेरा कार्य ही मेरा सच्चा स्मारक है। जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया, वह स्थान आज गाडगे नगर के नाम से जाना जाता है।
शिक्षा वह है जो हमें बंधनों से मुक्त करती है और हमें शांति, एकता और सद्भाव प्रदान करती है।” –संत गाडगे बाबा
गाडगे बाबा के सामाजिक कार्य
स्वच्छ गाँव आंदोलन –
गाडगे बाबा घूमते फिरते समाज सुधारक थे, वह पैरों में टूटी चप्पल, हाथ में मिट्टी का कटोरा और झाड़ू ले कर एक गाँव से दूसरे गाँव घूमते रहते थे। उन्होंने गाँव गाँव जाकर लोगों को स्वच्छता के लिए परारित करते थे।
वह खुद हाथ में झाड़ू लेकर कभी मेले की तो कभी गाँव गली की सफाई करते रहते, लोगों के जूठे डन, पत्तल वह खुद ही उठाते थे। झाड़ू उनकी जनसेवा का प्रतीक बन गई थी।
वह कहते थे की मंदिर में पथरीले भगवान की पूजा करने से क्या लाभ होगा? वह कहते थे कि इससे बेहतर है लोगों की सेवा करो, भूखे को रोटी खिलाओ। पूजा के उन फूलों से मेरा झाड़ू ही श्रेष्ठ है।
वह लोगों स्वच्छता और सामाजिक कार्यों के लिए उपदेश देते, उन्हें गाकर इन सदेशों को सुनाते।
सामाजिक जागरूकता
वह लोगों को मांस मदिरा से दूर रहने का उपदेश देते। वह जातिप्रथा, धार्मिक कर्मकांड, अंधविश्वास, बलिप्रथा,हुंडा प्रथा, दहेज प्रथा जैसी कुप्रथाओं को खत्म करने के लिए प्रेरित करते। वह लोगों को शिक्षा की तरफ अग्रसर करने प्रेरित करते थे। वह कहते थे शिक्षा के बिना इंसान पत्थर के समान है।
निष्काम सेवा भावना
वह हर काम में लोगों की मदद करने को आतुर रहते थे, जिन्हें उनकी मदद होती थी।
वह बीमार की सेवा करने लगते थे तो कभी उनके लिए स्वादिष्ट भोजन करते।
साफ सफाई, खेती बाड़ी, आदि कामों में भी मदद करते थे। वह हमेशा लोगों को एकसमान नजर से देखने को प्रेरित करते थे।
लोग उन्हें अलग अलग नामों से पुकारतेथे। कोई डेबूजीबुवा, तो कोई चापरेबुवा कहता, कोई उन्हे वट्टीसाधु तो कोई उन्हें गोधड़े महाराज कहता।
कोई उन्हें लोटके महराज तो कोई उन्हें चिंधेबुवा कहता।
आज हम सब उन्हें संत गाडगे बाबा या संत गाडगे महाराज के नाम से जानते हैं। गाडगे बाबा ईरानी मूल के भारतीय आध्यात्मिक गुरु , दार्शनिक और चिंतक से मिले थे। मेहेर बाबा ने संत श्री गाडगे बाबा को अपने पसंदीदा संतों में से एक कहा।
गाडगे बाबा ने मेहेर बाबा को पंढ़रपुर आमंत्रित किया था। 6 नवंबर 1954 को हजारों लोगों ने एक साथ मेहेर बाबा और गाडगे बाबा के दर्शन किये। उनकी फोटो मेहेर बाबा की वेबसाईट पर देखी जा सकती हैं।
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गाडगे बाबा की विरासत
संत गाडगे ने गाडगे महारज मिशन की स्थापना की। गाडगे बाबा ने 12 धर्मशालाएं बनवाईं। उनके द्वारा 31 स्कूल, और कॉलेज आज भी उनकी संस्था के द्वारा संचालित की जाती हैं, यह सभी बाबा गाडगे की विरासत की कहानी बयां करती हैं।
उनके समाधि स्थल पर समाधि मंदिर की स्थापना की गई, जिसका रखरखाव और संचालन भी उनकी संस्था गाडगे महाराज मिशन द्वारकी जाती है।महाराष्ट्र सरकार ने उनके सम्मान में अमरावती में यूनिवर्सिटी का नाम “Sant Gadge Baba Amravati University” के रखा है।
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